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Guru Vachan

सत्य एक ही हे! गणित के कितने भी सवाल हल करो, गलत उत्तर अलग-अलग होंगे, मगर सही उत्तर एक ही होगा, क्योंकि सत्य एक ही हे!

यह जो जीभ है न इसका एक सिरा दिल से व दूसरा दिमाग से जुडा है! इसलिए दिल और दिमाग को जोड़कर बोलना चाहिये!

दुनिया बनाने वाले ने सबकी आँखें आगे की ओर लगाई हैं ताकि वह सदेव आगे की ओर बढ़ते रहें!

जो व्यथाऍं प्रेरणा दें,
उन व्य्थाओं को दुलारो,
जूज्ञ कर कठनईयों से रंग जीवन का निखारो,
बृक्ष कट -कट कर बढा हे,
दीप बुज्ञ -बुज्ञ कर जला हे,
मृत्यु से जीवन मिले तो उसकी आरती उतारो!

इन्सान के हाथों से पत्थर से गढी हुई मूर्ति में हमने भगवान को तराशने की कोशिश की लेकिन भगवान के हाथों से बने हुए बिलखते मासूम बच्चों में हम अपने परमात्मा को नहीं देख पाए यह एक दुर्भाग्य है। आज उस भगवान को मासूमों के अन्दर ढूढने की आवश्यकता है। इन मासूम बच्चों की सेवा करते हुए परमात्मा को ढूढने की कोशिश कर।

जैसे ऐक पत्थर को तराशने से सुन्दर मूर्ति बन सकती है ऐसे ही कर्मों के सहारे ज़िन्दगी को तराशने से ज़िन्दगी का स्वरूप बहुत सुन्दर बन सकता है। बडों के प्रति सम्मान की भावना, आत्मीयजनों के प्रति कोमलता, स्वयं के प्रति निरीक्षण की भावना रखते हुए आत्मचिंतन के शीशे में अपने को रोज निहार।

दूसरों को सुधारने का उपदेश देना जितना सरल है, स्व्यं को सुधारना उतना ही कठिन है!

किसी के गुणों को बढाने वाले बने, दोशों का बखान न करें!

सग्रंह करता जाये और आनन्द मना न पाये ऐसा व्यक्ति अभागा है और वह व्यक्ति भाग्यशाली है जो भगवान की देन के प्रति हर रोज शुक्र मनाये और आनन्द मनाये!

रोग न लगजाये
कैसा भी बनके, किसी भी जैसा बन के, किसी जैसा बनना बाकी ही रह जायेगा! आप किसी जैसा नहीं बन सकते हैं सब जैसा नहीं बन सकते आप कुछ से आगे हो सकतें हैं! सबसे आगे नहीं हो सकते! कुछ के बराबर हो सकते हैं कुछ के बराबर नहीं हो सकते, अत: सावधान कहीं किसी के जैसा बनने का रोग न लग जाए!

संसार की प्रत्येक वस्तु का अपना ऐक धर्म होता हे! पानी का भी ऐक धर्म हे - शीतलता देना, तृप्ति देना, गीला करना! अगर पानी अपने गुंण को छोड दे तो फिर पानी का अस्तित्व नहीं बचता! मनुष्य भी जब अपने धर्म में स्थिर रहता हे, मानविय गुणों से युक्त रहता हे तभी वह मनुष्य कहलाता हे! यदि मनुष्य मानविय गुणों को छोड देता हे तो फिर वह मनुष्य नहीं पशु हे, तब वह दानव कहलाता हे! शास्त्र में कहा गया हे कि अपनी आत्मा के विपरीत व्यवहार किसी के साथ न करें! जो व्यवहार अपने प्रति आपको पसन्द हे, वही व्यवहार दूसरों के साथ करो, इसी का नाम धर्म हे!

धर्म मानवता का प्राण्
धर्म जीवन का महत्वपूर्ण अंग हे, जिसके बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, समाज भी जीवित नहीं रह सकता! जिसके बिना हमारा व्यवहार् या व्यापार कुछ भी काम का नहीं रह जायगा! इसलिये धर्म जीवन का अनिवार्य अंग् हे!

प्रगति पथ में अवरोधक है चिन्ता
जब आप किसी बात कि चिन्ता करते=करते कइ रातें जागते हुए बिता देते हैं, तो आप देखते हें कि समस्या जहां की तहां हे, परन्तु आपका तन - मन थक चुका हे, प्रास्त हो गया हे! इससे स्पष्ट हो जाना चाहिए कि आपकी चिन्ता ने समस्या को सुलझाने में आपको सहायता नहीं पहुंचाई, बल्कि शरीर तथा मन की कार्यशक्ति ही हरण कर ली! फिर भला ऐसी चीज़ को मन में जगह देना कहां तक ठीक हे!

चिन्ता चिन्ता जिन्दे को जलाती जब कि चिता मुर्दे को जलाती हे ईसलिय चिन्ता से बचिए!

भय और चिन्ता हमारे अवचेतन मन को हमारी इच्छापुर्ति करने से रोक देतीं हैं! हमारी यही चिन्ता हम जिस कार्य को करके दिखा देना चहते हें, पूर्ण होगा य नहीं, हमारे उस कार्य के पूर्ण होने में बाधक हो जाती हैं, क्योंकि जिस समय मन संदेह्ग्रस्त होता हे, उस समय वह रचना का निर्माण प्रभावशाली ढंग से नहीं कर पाता!

मूल
संसार में हर वस्तु का मूल्य चुकाना होता हे! बिना त़प किये कष्ट सहे आप अधिकार, पद, प्रतिष्ठा, सत्ता, सम्पति, शक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, अत: आपको तपस्वी होना चाहिए आलसी, आराम पसंद नहीं! जीवन के समस्त सुख आपके कठोर पर्रिश्रम के नीचे दबे पड़े हैं, इसे हमेशा याद रखिए!

तन उजला, मन काला
तन उजला, मन काला, बगुले जैसा भेष।
इससे तो कौआ भला, बाहर भीतर एक।

अहिंसक
मनष्य को अहिंसक होना चाहिए, हिंसक नहीं।अहिंसक होने से मुनष्य को लाभ मिलता है कि उसका वैर पूरी तरह से समाप्त हो जता है।

जीत या हार के बीच में डर हे, जो हार से डर गया समज्ञो जीत हार गयी, जो हार से नहीं डरा जीत, जीत गयी! ईस लिए हार से डरो मत सोचो जीतोगे और ज़रूर जीतोगे!

कामनाओ के आवेश को रोक लो आगे बढ जाओगे, मोह को प्रेम में बदल लो तो आगे बढ जाओगे! अभिमान को विनम्रता से जीत लो उन्नति हो जायगी!

सुधनम
चाणक्य कहते है कि जिसका धन शुद्ध है, उसके घर मे सुख सम्पत्ति है।पुराने लोगों ने चार शब्ध कहे थे जो बडे महत्त्व के है। चार शब्दों पर गौर करना "धृत नया धान पुराने घर कुलवंती नार।"

भक्ति
भक्ति निष्काम भाव है आस्था का, समर्पण का, सेवा का, बलिदान - करने का, बदले में कुछ ना चाहने का, आध्यात्मिकता का प्रथम सोपान है।

स्वदेश का प्यार
भरा नही जो भावों से बहती जिसमें रसधार नही।
हृदय नहीं वह प्थ्त्तर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नही।

जब तुम्हारे दरवाजे पर कोई मांगने आता हे तो यह मत समज्ञना कि मांगने वाला है! वह तुम्हे चेतावनी देने आया हे कि कभी होते हुए हमने नहीं दिया था तो आज इस जन्म में हमारे हाथ में कटोरा आ गया, तुम होते हुए जरूर देना, क्योंकि मालिक का पता नहीं, क्या खेल रचता हे? पता नहीं चलता, कब वह कटोरा बदल देता हे! मेरे हाथ से तुम्हारे हाथ में, तुम्हारे हाथ से मेरे हाथ में, कही ऍसा न हो कि मेरे हाथ का कटोरा तेरे हाथ में चला जाए!

चिन्ता भय से ग्रस्त मनुष्त किसी कार्य को आरम्भ ही नहीं करता क्योंकि वह अपने मार्ग में अनेकों बाधाएं देखने लगता हे और यदि वह आरम्भ कर भी दे तो चिन्ता का बोज्ञ उठाने से वह इतना थक जाता हे कि कार्य का बोज्ञ उठाना उसके बस का नहीं होता ! इस लिय चिंता मत करो!

पुण्य नहीं कमा सकते तो घर में पाप लेकर मत आओ! जिस घर में पुण्य की कमाई आये, वहाँ से स्वर्ग की खुशबू आया करती है! सारी शक्तियां घर में आ जायेंगी और जीवन में कोई कमी नहीं रहेगी!

अचल रहा जो अपने पथ पर लाख मुसीबत आने में,
मिली सफलता जग में उसको जीने में मर जाने में!
खडा हिमालय् बता रहा हे डरो न आंधी पानी से,
खडे रहो अपने पथ पर सब कठिनाई तुफानों में!

हे प्रभु हमारा ह्रदय आपके श्री चरणों से जुडे रहें
हे जीवन के आधार। सुख स्वरूप सचिदानंद परमेशवर। समस्त संसार में आपने अपनी कृपाओं को बिखेरा हुआ है। हमारा क्षद्धा भरा प्रणाम आपके श्रीचरणों में स्वीकार हो। हे प्रभु। जब हम अपने अंतर्मन में शान्ति स्थापित करते हैं तब हमारे अन्त: स्थ में आपके आनन्द की तरंगें हिलोरें लेने लगती हैं और हमारा रोम-रोम आनन्द से पुलकित होने लगता है। जिससे हमारा व्यवहार रसपूर्ण और प्रेमपूर्ण हो जाता है। हे प्रभु! हमारा ह्रदय आपसे जुडा रहे, हम पर आपकी कृपा बरसती रहे, हमारा मन आपके श्रेचार्नोनें लगा रहे, यह आशीर्वाद हमें अवश्य दो। ताकि हम पर हर दिन नया उजाला, नई उमंगें, नया उल्लास लेकर जीवन के पथ पर अग्रसर हो सकें! ऐसी हमारे ऊपर कृपा कीजिए। हे दयालु दाता। हमें ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि हम प्रत्येक दिन को शुभ अवसर बना सकें। प्रत्येक दिन की चुनौती का सामना करने के लिए हमें ऐसी शक्ति प्रदान कीजिए कि जिससे हम संघर्ष में विजयी हों। हमारे द्वारा संसार में कुछ भी बुरा न हो, प्रेमपूर्ण वातावरण में श्वास ले सकें तथा प्रेम को संपूर्ण संसार में बाँट सकें। हे प्रभु! हमें यह शुभाशीष दीजिए। यही आपसे हमारी विनती है, यही याचना है। इसे स्वीकार कीजिए।

खुशामद -पसंद व्यक्ति अपने आप को धोका देते हें! अपने कानों को अपना विरोध सुनाने की शक्ति दो!

शान्ति के समान कोई तप नहीं हे!
संतोष से बढ्कर कोई सुख नहीं हे!
तृष्णा से बढकर कोई व्याधि नहीं हे!
दया के समान कोई धर्म नहीं हे!
सत्य जीवन हे और असत्य मृत्यु हे!
घृणा करनी हे तो अपने दोषों से करो!
लोभ करना हे तो प्रभू के स्मरण का करो!
बैर करना हे तो अपने दुराचारों से करो!
दूर रहना हे तो बुरे संग से रहो!
मोह करना हो तो परमात्मा से करो!

दुनिया में बहुत से ऐसे भी लोग होते हें जो उपर -उपर से दया कर रहे होते हैं और अन्दर उनके बैर का कांटा उपजा होता हे, हिंसा से सने होते हैं! ऐसे लोग सत्संग -भजन, लडाई झगडा सब साथ -साथ कर रहे होते हैं अगर कोई दुकान में बैठा हे और गरीब भीख मांगने वाला सुभह -सुभह आ जाए तो हाथ में डण्डा पकडा हुआ हे और बोलता भी जाता हे कि -
राम राम राम .....राम राम राम

प्रसन्नता को पाने के लिए परमात्मा का शुक्रगुजार रहना चाहिए और पर्मात्मा के द्वारा बनाए गए जो नियम हैं, अनुशासन हैं उनके द्वारा जीवन को जीने की कोशिश करनी चाहिए! जिसके जीवन में अनुशासन है, नियंत्रण करने की शक्ति हे, अंकुश हे तो उसके चेहरे पर सदा मुस्कराहट का दीप जलता रहेगा, उसकी मुस्कराहट बुझ नहीं सकती!

मोती ग्यान के
जीतने के लिये प्रेम जीतो!
पीने के लिये क्रोध पीयो!
खाने के लिये गम खाओ!
देने के लिये दान दो!
लेने के लिये ग्यान लो!
कहने के लिये सत्य कहो!
रखने के लिये इज्जत रखो!
फेंकने के लिये ईर्ष्या फेंको!
छोडने के लिये मोह छोडो!
दिखाने के लिये दया दिखाओ!

चार गुण बहुत दुर्लभ हैं, धन में पवित्रता, दान में विनय, वीरता में दया और अधिकार में निराभिमानता!

विचार ही जीवन की शक्ति हे, जीवन विचारों का खेल हे, जीवन में पवित्र विचारों को अपनाने की कोशिश करो! दूशित विचार -शक्ति को पवित्र बनाओ! जिससे दुर्जन, सज्जन बन जाएं, सज्जनता के विचार दुनिया में फैलें और दुष्टता मिट जाए!

अंधा वह नहीं जिसके आँखें नहीं होती, अंधा वह हे जो अपने दोषौं को ढंकता है!
पूज्य श्री सुधांशुजी महाराज

जीवन में तीन बातों का सदा स्मरण करो! १- क्रोध पर नियन्त्रण २- स्वभाव में उदारता ३- अधिकार में सहिष्णुता

क्रोध से क्रोध को नहीं जीता जा सकता! हिंसा से हिंसा को दबाया नहीं जाता! आग को आग से बुझाया नहीं जा सकता! खून के छीटों से कभी शांति नहीं आया करती! नफरत पैदा करते करते इंसान अपने घर में सुख शांति नहीं ला सकता!

दुनिया को देखना बुरा नहीं है, उसके प्रति आसक्ति बनाना बुरा है!
जिसके अन्दर जितना अधिक मोह होगा वह उतना ही दुखी रहेगा!

गुरु सब पर एक जैसी कृपा करते हें लेकिन जो अपने को रंगने को तैयार हे, उन पर ही रंग चढेगा!

हम गुरु को मानते हें, मगर गुरु की नहीं मानते! गुरु की सबसे बडी सेवा गुरु के बताये मार्ग पर चलना है!

हजारों मील की यात्रा किसी एक कदम से ही शुरु होती है, एक एक कदम से व्यक्ति आगे बढ्ता हे, एक एक कदम उस परमात्मा की ओर बढते जाओ, सफलता अवश्य मिलेगी!

तुम प्रकाश हो! तुम्हारी शक्ति अप्रतिम है! लेकिन तुम अपनी शक्ति को भूल गये हो! पिता परमात्मा ने तुम्हें ज्योतिरूप में इस जगत में भेजा है! तुम्हें अपने हिस्से का प्रकाश फैलाना है! जहाँ भी रहो उस स्थान को प्रकाशित करते रहो!

अभिमान को हटाओ, विनम्र रहो! घास की तरह लचीलापन रखो! लचीलापन जिसमें ज्यादा है वह सुरक्षित ज्यादा है!

अगर आप अपनी उर्जा शक्ति को बढा लें तो कुछ् भी कर सकते हैं!
जो आप को अपने आप से मिला दे उस का नाम सदगुरु है!
दीन हीन होकर निराश होकर मत जीओ!

जीवन में हर परिस्थिति में प्रसन्न रहने का स्वभाव बनाओ!
प्रसन्न रहने के लिए कुछ चीजों का पालन करना चाहिए!
१-ऐसे न कमाओ की पाप हो जाए,
२-ऐसे कार्यों में न उलझो की चिंता का जन्म हो जाए,
३-ऐसे न खर्च करना की कर्ज हो जाए,
४-ऐसे मदमस्त होकर न खाना की मर्ज हो जाए,
५-ऐसी वाणी न बोलना की कलेश हो जाए,
६-संसार की उबड़ खाबड़ राहों में ऐसे लड़खड़ाकर न चलना कि देर हो जाए प्रसन रहने के लिए यह महत्वपूर्ण संदेश है!

जाना बहुत मगर जो जानना चाहिये था वह जाना नहीं, हां ऐक अहंकार और सिर चढ जाता है किताबों का कि इतनी किताबें पढी हैं इतनी डिगरी हैं!

वीर वह हे जो दुशमन की दुष्टता को मिटाए और अपना बना ले, दुशमन की दुष्टता को मिटा दे दुशमन को नहीं!
दुनिया कि चीज़ओं से जब आप कठोर हो जायें तो सतसंग में जाओ और ढीले हो जाओ!

ध्यान रखो कि सज्जनता को बढाओ और मूर्खता को कम करो!
शक्ति से अत्याचार मत करो, अत्याचार को मिटाओ, दुष्ट को बढावा मत दो, दुष्टता को मिटाओ!

हमारी जिन्दगी दो किनारों के बीच चलती हे, कभी दुख कभी सुख, कभी मान कभी अपमान, कभी लाभ कभी हानि, संतुलन बना कर रहो और मन को शांत रखो!

ब्रत का मतलब भूखे रहना नहीं हे, मन को काबू मैं रखना हे!

एकता जब आती हे, जब सब अपनी अपनी अकड छोड कर झुकना जान जाएं, नहीं तो विघटन रहता हे!
घमंड भरी आंखें, गलत गवही देने वाली जीभ, दुख देने वाले हाथ, गलत रासते पर चलने वाले पैर भगवान को पसंद नहीं हें!

घमंड भरी आंखें, गलत गवाही देने वाली जीभ, दुख देने वाले हाथ, गलत रासते पर चलने वाले पैर, भग्वान को पसंद नहीं हैं! किसि को भी अपनी फूट का फायेदा मत ऊठाने दो! शांत ईंसान, प्रेम से भरे ईंसान, दया से भरे ईंसान के पास अगर शक्ति होगी तो भला होगा!

पुण्य नहीं कमा सकते तो घर में पाप लेकर मत आओ! जिस घर में पुण्य की कमाई आये, वहाँ से स्वर्ग की खुशबू आया करती है! सारी शक्तियां घर में आ जायेंगी और जीवन में कोई कमी नहीं रहेगी!

शान्ति के समान कोई तप नहीं हे!
संतोष से बढ्कर कोई सुख नहीं हे!
तृष्णा से बढकर कोई व्याधि नहीं हे!
दया के समान कोई धर्म नहीं हे!
सत्य जीवन हे और असत्य मृत्यु हे!
घृणा करनी हे तो अपने दोषों से करो!
लोभ करना हे तो प्रभू के स्मरण का करो!
बैर करना हे तो अपने दुराचारों से करो!
दूर रहना हे तो बुरे संग से रहो!
मोह करना हो तो परमात्मा से करो!

खुद खा लेना प्रकृति कहलाती है!
दूसरों का हिस्सा भी खा लेना विकृति कहलाति है!
अपना हिस्सा भी दूसरों को देदेना संसकृति कहलाती है!

भगवान ने जिन्दगी दी हे पर जिन्दगी जीने तरीका नहीं दिया वह गुरु देता हे!
धन को इतना महत्व मत दो कि रिशते ही खतम हो जायं!

तर्क और बहस बहस से आग निकलती है और तर्क से रोशनी! बहस से अंहकार और बददिमागी उपजती है जबकि तर्क से खुले दिमाग या सीखने की भावना आती है! बहस से अज्ञानता की नुमाइश होती है जबकी तर्क से ज्ञान की! बहस से यह साबित करने की कोशिश की जाती है कौन सही है जबकी तर्क में यह साबित किया जाता है की क्या सही है!

दुख से तो भगवान भी नहीं बचे तो आप कैसे बच सकते हें!
दुख को भगवान का प्रसाद समझना!

कोई कहे पेड से कि तुम अपने फल और फूल किसी को मत दो तो क्या पेड देना छोड देगा, नहीं वह तो सब को दे कर खुश होता हे - लोग पत्थर मारते हें तब भी वह फल देता है!

प्रेम, शांति, आनन्द वाले बनो, भगवान भी आपको यह सब चीजें देगा!
भगवान को धन्यवाद दो कि जो दिया बहुत दिया, जो नहीं दिया उसकि शिकायत मत करो!

कायरता का नाम भक्ती नहीं है, भक्त तो दुष्टत बाहर की और अपने अन्दर की भी खतम करना जानता है!
जब कोई बस नहीं चलता तो कहते हें चलो माफ किया ऐसा नहीं होना चाहिये, दुष्टता को माफ मत करो!

 

 

 



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